
बांसवाड़ा। सिंधी समाज द्वारा भाद्रपद कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि (3 सितंबर) को पारंपरिक एवं धार्मिक आस्था का पर्व ‘थदरी’ घर-घर में मनाया जाएगा। प्राचीन सिंध प्रांत से चली आ रही इस परंपरा में शीतला माता की पूजा-अर्चना कर परिवार के उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
सिंधी भाषा में ‘थदरी’ का अर्थ ‘ठंडा’ होता है। इस पर्व के तहत एक दिन पूर्व (षष्ठी) को महिलाएं रसोई और चूल्हे की पूरी सफाई करके ‘मीठा लोला’ (मीठी रोटी), बेसन की पूरी, दही व विभिन्न पकवान बनाती हैं। सप्तमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और पूरे दिन केवल ठंडा भोजन ही ग्रहण किया जाता है।
धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व:
* धार्मिक मान्यता: मान्यता है कि शीतला माता की पूजा करने और ठंडे भोजन का भोग लगाने से चेचक, खसरा व त्वचा संबंधी रोगों से परिवार की रक्षा होती है।
* वैज्ञानिक कारण: भाद्रपद माह के बदलते मौसम में शरीर का तापमान नियंत्रित रखने और पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के लिए ठंडा व सुपाच्य भोजन लाभदायक होता है। साथ ही, चूल्हा न जलने से घर की महिलाओं को रसोई के काम से एक दिन का विश्राम मिलता है और स्वच्छता से संक्रमण का खतरा कम होता है।
सुशील नोतनानी संस्थापक- अध्यक्ष
सिंधी शक्ति संगठन आगरा.
दिनांक 2 सितंबर 2026
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