उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के दुर्गापुर स्थित आवास में सेवानिवृत्त जिला विकलांग अधिकारी जावेद फारुकी (65) का शव बिस्तर पर मिलना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के भीतर पल रहे गहरे अकेलेपन की भयावह तस्वीर पेश करता है। यह घटना उस सामाजिक ढांचे पर सवाल खड़े करती है, जहां लोग भीड़ में रहते हुए भी एक-दूसरे से कटते जा रहे हैं। घर के भीतर मौत 24 घंटे तक पड़ी रही और बाहर की दुनिया को कोई आहट तक नहीं मिली—यह दृश्य अपने आप में सभ्यता पर एक कठोर टिप्पणी है।
आगरा से सेवानिवृत्त जावेद फारुकी की मौत का खुलासा तब हुआ, जब लंबे समय तक घर से कोई हलचल न दिखने पर पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना दी। दरवाज़ा तोड़कर अंदर प्रवेश किया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। असल सवाल यह नहीं कि मृत्यु किस कारण हुई, बल्कि यह है कि एक इंसान के चले जाने की खबर इतने समय तक किसी को क्यों नहीं हुई।
एक घर, एक मौत और 24 घंटे का सन्नाटा
रिटायरमेंट के बाद जावेद फारुकी अपनी पत्नी जबी—जो पेशे से शिक्षिका हैं—और छोटी बेटी के साथ रहते थे। पत्नी और बेटी कुछ दिनों के लिए बाहर गई हुई थीं। इसी दौरान अकेले रह रहे फारुकी को संभवतः दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई। दुखद यह रहा कि आसपास लोग रहते हुए भी समय रहते किसी को इस अनहोनी का आभास नहीं हुआ।
शोर से भरी दुनिया, भीतर की खामोशी
इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए सेंटर फॉर सेल्फ एंड करियर डेवलपमेंट (सीएससीडी) के निदेशक डॉ. नवीन गुप्ता कहते हैं कि यह मृत्यु हमारे समय की सामाजिक हकीकत को उजागर करती है। उनके अनुसार, हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां बाहर का शोर बढ़ता जा रहा है, लेकिन भीतर का सन्नाटा घातक बन चुका है। रेस्तरां, मॉल और पर्यटन स्थल लोगों से भरे हैं, सड़कें जाम से जूझ रही हैं, लेकिन व्यक्ति भीतर से गहरे अकेलेपन का शिकार है। यह घटना रिश्तों की औपचारिकता और सामाजिक उदासीनता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
एक ही छत के नीचे भावनात्मक दूरी
आज परिवार साथ रहते हुए भी भावनात्मक रूप से बिखरते जा रहे हैं। करियर और सुविधाओं की दौड़ में बच्चे न केवल भौगोलिक रूप से, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी दूर हो गए हैं। दिन की शुरुआत औपचारिक अभिवादन से होती है और अंत एक संक्षिप्त ‘गुड नाइट’ पर। बीच का समय मोबाइल स्क्रीन और नोटिफिकेशन निगल जाते हैं। बुजुर्गों के साथ बैठकर बात करना अब समय की कमी का शिकार हो गया है।
वृद्धाश्रम: त्याग नहीं, एक नया चुनाव
इसी भावनात्मक खालीपन का नतीजा है कि आज अच्छे वृद्धाश्रमों की मांग लगातार बढ़ रही है। यह केवल पारिवारिक असफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना में आए बदलाव का संकेत है। अब आधुनिक और सुविधायुक्त वृद्धाश्रम कई बुजुर्गों के लिए अंतिम विकल्प नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक जीवनशैली बनते जा रहे हैं, जहां वे अपने हमउम्र लोगों के बीच सम्मान और सुकून के साथ समय बिताना चाहते हैं। यह स्थिति अपने आप में यह प्रश्न खड़ा करती है कि क्या घर अब भावनात्मक सुरक्षा देने में सक्षम नहीं रहे?
डॉ. नवीन गुप्ता बताते हैं कि उनके एक परिचित ने पहले ही एक अच्छे वृद्धाश्रम में अपने लिए स्थान सुरक्षित कर लिया है, ताकि समान उम्र के लोगों के बीच कुछ समय शांति से बिताया जा सके। कई बुजुर्ग मानने लगे हैं कि साल के कुछ महीने ऐसे स्थानों पर बिताना मानसिक और भावनात्मक रूप से अधिक संतुलन दे सकता है।
समाज के नाम एक सख्त चेतावनी
सीतापुर की यह घटना पूरे समाज के लिए चेतावनी है। यह बताती है कि अकेलापन अब केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं, बल्कि हर उम्र को चुपचाप घेर रही सामाजिक बीमारी बन चुका है। यदि समय रहते रिश्तों में संवाद, संवेदना और सहभागिता नहीं लौटी, तो बंद दरवाज़ों के पीछे ऐसी ही खामोश मौतें होती रहेंगी और हम उन्हें महज एक खबर बनाकर भूलते चले जाएंगे।
अब भी समय है। किसी पड़ोसी से हाल पूछ लेना, माता-पिता के पास कुछ देर बैठ जाना, मोबाइल दूर रखकर बातचीत कर लेना—ये छोटे कदम किसी बड़ी त्रासदी को रोक सकते हैं। क्योंकि कई बार एक साधारण फोन कॉल, एक दस्तक या एक सच्ची पूछताछ किसी ज़िंदगी को बचा सकती है। मौत से भी अधिक भयावह वह जीवन है, जिसे जीते-जी कोई महसूस न करे।
