AI का ‘डार्क साइड’: ​टेक्नोलॉजी की प्यास; क्या डेटा सेंटरों की भूख हमारे जल और बिजली संसाधनों को निगल जाएगी?

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ये है AI का भयावह सत्य जो आम नागरिक को नहीं पता। आज दुनिया भर में बड़े-बड़े “मेगा डेटा सेंटर” बनाए जा रहे हैं, जो क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई मॉडल और डिजिटल सेवाओं को चलाते हैं। लेकिन इन केंद्रों की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि ये अत्यधिक पानी और बिजली की खपत करते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार एक बड़ा डेटा सेंटर रोज़ाना लगभग 2 लाख से 5 लाख गैलन पानी तक उपयोग कर सकता है। 1 गैलन लगभग 3.78 लीटर के बराबर होता है, यानी एक केंद्र प्रतिदिन लगभग 7.5 लाख से 19 लाख लीटर पानी तक इस्तेमाल कर सकता है। यह मात्रा कई सौ घरों की रोज़ाना जल आवश्यकता के बराबर होती है। यह पानी मुख्य रूप से सर्वरों को ठंडा रखने के लिए उपयोग होता है, क्योंकि मशीनें 24 घंटे चलती हैं और अत्यधिक गर्मी पैदा करती हैं।

भारत जैसे देश में, जहाँ कई बड़े शहर पहले से ही भूजल संकट झेल रहे हैं, यह खपत गंभीर चिंता का विषय बन सकती है। बेंगलुरु में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, चेन्नई में पानी का संकट पहले भी शहर को “डे-ज़ीरो” स्थिति तक ले गया था, और दिल्ली-एनसीआर में भी जल आपूर्ति पर भारी दबाव है। यदि एक शहर में 10 बड़े डेटा सेंटर स्थापित हो जाएँ और प्रत्येक औसतन 10 लाख लीटर पानी रोज़ ले, तो यह लगभग 1 करोड़ लीटर प्रतिदिन की खपत होगी। इतनी मात्रा स्थानीय जल स्रोतों, तालाबों और भूजल पर सीधा दबाव डालेगी।

बिजली की खपत भी उतनी ही बड़ी समस्या है। एक मेगा डेटा सेंटर की बिजली मांग सामान्यतः 30 मेगावाट से लेकर 100 मेगावाट तक हो सकती है। तुलना के लिए समझें तो 1 मेगावाट बिजली लगभग 800 से 1000 घरों की जरूरत पूरी कर सकती है। यदि कोई डेटा सेंटर 50 मेगावाट बिजली ले रहा है, तो वह लगभग 40,000 से 50,000 घरों की ऊर्जा खपत के बराबर है। अब यदि किसी राज्य में 10 ऐसे केंद्र स्थापित होते हैं, तो कुल मांग 500 मेगावाट तक पहुँच सकती है। भारत में अभी भी लगभग 70% से अधिक बिजली उत्पादन कोयले पर आधारित है। इसका मतलब है कि इन डेटा सेंटरों के लिए अतिरिक्त बिजली उत्पादन का सीधा संबंध कार्बन उत्सर्जन और वायु प्रदूषण से होगा।

इसके अलावा, डेटा सेंटर 24 घंटे लगातार चलते हैं। यह मांग मौसमी नहीं बल्कि स्थायी होती है। इससे पावर ग्रिड पर स्थायी दबाव बनता है। यदि नवीकरणीय ऊर्जा का पर्याप्त उपयोग नहीं हुआ, तो कोयले से चलने वाले संयंत्रों का विस्तार होगा, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन और बढ़ेगा। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों के अनुमान बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर डेटा सेंटर पहले ही दुनिया की कुल बिजली का लगभग 1–1.5% उपयोग कर रहे हैं, और एआई के बढ़ते उपयोग के कारण यह प्रतिशत तेजी से बढ़ सकता है।

भारत पहले से ही जल संकट, प्रदूषण और ऊर्जा मांग की चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में यदि कई अरब डॉलर के डेटा पार्क बिना सख्त पर्यावरणीय मानकों और जल-ऊर्जा संतुलन नीति के स्थापित किए जाते हैं, तो इससे स्थानीय संसाधनों पर भारी दबाव पड़ेगा। तकनीकी विकास आवश्यक है, लेकिन यदि उसकी कीमत पानी, बिजली और पर्यावरण संतुलन के रूप में चुकानी पड़े, तो दीर्घकाल में यह विकास असंतुलित साबित हो सकता है। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी बड़े डेटा सेंटर को स्थापित करने से पहले जल उपलब्धता, नवीकरणीय ऊर्जा अनिवार्यता, और कार्बन उत्सर्जन के स्पष्ट मानकों को कानूनी रूप से लागू किया जाए, ताकि डिजिटल प्रगति पर्यावरणीय संकट में न बदले।

लेखक -विशाल शर्मा जी की फेसबुक वॉल से साभार सहित

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