वर्ष 2026 भारतीय खेल इतिहास का एक स्वर्णिम पड़ाव है। यह वर्ष 1926 में भारतीय सेना की हॉकी टीम के ऐतिहासिक न्यूज़ीलैंड दौरे के 100 वर्ष पूर्ण होने का प्रतीक है। इसी दौरे से भारतीय हॉकी के स्वर्णिम युग का आरंभ हुआ और विश्व पटल पर भारत की खेल प्रतिभा का उदय हुआ। इस ऐतिहासिक यात्रा के केंद्र में थे ,मात्र 21 वर्षीय युवा खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद, जिन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा, कठोर साधना और राष्ट्रभक्ति से भारतीय खेलों को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाई।
जब भारत पराधीन था और विश्व भारत को उपेक्षा की दृष्टि से देखता था। तब मेजर ध्यानचंद ने अपनी जादुई हॉकी से पूरी दुनिया को भारत की शक्ति, प्रतिभा और आत्मगौरव का परिचय कराया। उन्होंने अपने हाकी जीवन काल में एक हजार से अधिक गोल किए, जिसमें पांच सौ से अधिक अंतर्राष्ट्रीय गोल शामिल है, जो विश्व हॉकी में ऐसा कीर्तिमान है जो एक शतक उपरांत भी अजेय भारत को गौरवान्वित कर रहा है । ध्यानचंद को उनकी विलक्षण खेल प्रतिभा के कारण दुनिया ने सदैव “हॉकी के जादूगर” कहकर संबोधित किया।
सन 1928 एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारत ने पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता। जिसमें ध्यानचंद ने 103 डिग्री बुखार में रहते हुए फायनल मैच में मेजबान हॉलैंड को 3 के मुकाबले 0 गोल से पराजित करते हुए स्वर्ण पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। ये गोल ध्यानचंद की हाकी स्टिक से ही निकले।
सन 1932 लॉस एंजेल्स ओलंपिक में भारत ने अमेरिका को 24–1 से पराजित कर विश्व को अपनी श्रेष्ठता का परिचय दिया, जिसमें ध्यानचंद और उनके भाई कैप्टन रूप सिंह की जोड़ी ने इतिहास रच दिया।
सन 1936 बर्लिन ओलंपिक में मेजर ध्यानचंद की कप्तानी में फ़ाइनल मैच में तिरंगे की शपथ और वन्देमातरम गान के साथ भारत ने मेजबान जर्मनी को 8–1 से पराजित कर लगातार तीसरा ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतकर विश्व खेल इतिहास में अमिट अध्याय लिखा।
सन 1935 ऑस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड दौरे में ध्यानचंद ने गोलों का दोहरा शतक लगाया जिसे देखकर महान क्रिकेटर सर डॉन ब्रैडमैन ने उनकी गोल करने की क्षमता को लेकर कहा था—
“You score goals in hockey the way we score runs in cricket.”
यह कथन उनकी असाधारण प्रतिभा का वैश्विक प्रमाण है।
मेजर ध्यानचंद केवल महान खिलाड़ी ही नहीं थे, बल्कि राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, त्याग और समर्पण के जीवंत प्रतीक थे। कहा जाता है कि जब जर्मनी के तत्कालीन शासक एडोल्फ हिटलर ने उन्हें जर्मनी में उच्च पद और आकर्षक वेतन का प्रस्ताव दिया, तब उन्होंने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार करते हुए अपने देश के प्रति निष्ठा को सर्वोपरि रखा। उनका सम्पूर्ण जीवन भारत माता की सेवा को समर्पित रहा।
माननीय प्रधानमंत्री जी,
आज भी करोड़ों भारतीयों के मन में यह प्रश्न है कि जिस खिलाड़ी ने गुलामी के दौर में भारत को विश्व खेल मंच पर सम्मान दिलाया, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का मार्ग प्रशस्त किया, वह आज तक देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से वंचित है।
भारतीय हॉकी के 100 वर्ष पूर्ण होने का यह ऐतिहासिक अवसर इस राष्ट्रीय ऋण को चुकाने का सर्वोत्तम समय है।
अतः देश के करोड़ों खेल प्रेमियों, युवाओं एवं नागरिकों की ओर से आपसे विनम्र प्रार्थना है कि—
“हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद जी को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाए।”
यह सम्मान केवल एक महान खिलाड़ी का सम्मान नहीं होगा, बल्कि भारतीय खेल संस्कृति, राष्ट्रभक्ति, त्याग, अनुशासन और उन असंख्य खिलाड़ियों के संघर्ष का सम्मान होगा जिन्होंने देश का गौरव बढ़ाया है।
मेजर ध्यानचंद के जीवन का वह अंतरंग कथन जो उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर से कहा था_देश ने मुझे क्या दिया है यह महत्वपूर्ण नहीं है , यह मेरा कर्तव्य और दायित्व है कि मैने अपने देश और भारत मां को क्या दिया है?
इस कथन से प्रेरित हम, आपसे आपके सकारात्मक एवं ऐतिहासिक निर्णय की आशा करते हैं कि आप मेजर ध्यानचंद को सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने की कृपा करेंगे।


