पटना। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की रिहाइश को लेकर परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। 10, सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास खाली करने के नोटिस के बाद जहां महुआबाग का नया बंगला अभी निर्माणाधीन है, वहीं कौटिल्य नगर स्थित मौजूदा आवास भी अब कानूनी जांच के घेरे में आ गया है। इससे लालू यादव की मुश्किलें और बढ़ती नजर आ रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बढ़ी चिंता
इस पूरे विवाद में सुप्रीम कोर्ट का 25 नवंबर 2024 का एक अहम फैसला काफी प्रासंगिक माना जा रहा है। अदालत ने तेलंगाना के एक मामले में स्पष्ट किया था कि सांसदों, विधायकों या विशेष वर्गों को नाममात्र की कीमत पर सरकारी जमीन देना मनमाना, तर्कहीन और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे आवंटन को सत्ता का दुरुपयोग मानते हुए रद्द कर दिया था। माना जा रहा है कि यही सिद्धांत बिहार के मामलों पर भी लागू हो सकता है।
कौटिल्य नगर का मकान जांच के दायरे में
सामाजिक कार्यकर्ता गुड्डू बाबा की शिकायत के बाद बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने लालू यादव के कौटिल्य नगर स्थित मकान की वैधानिकता की जांच की तैयारी शुरू कर दी है। कौटिल्य नगर का पुराना नाम सांसद-विधायक कॉलोनी है और डाक पते में आज भी यही दर्ज है। यदि जांच आगे बढ़ती है तो यहां रहने वाले कई मौजूदा और पूर्व सांसद-विधायक भी इसकी जद में आ सकते हैं। अनुमान है कि इस इलाके में करीब 200 से अधिक जनप्रतिनिधि रहते हैं।
जमीन आवंटन का पुराना इतिहास
वर्ष 1987 से फरवरी 1990 के बीच, जब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी, तब मौजूदा और पूर्व सांसद-विधायकों के लिए एक कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाई गई। इस सोसाइटी में कुल 531 सदस्य थे। कौटिल्य नगर की करीब 15 एकड़ जमीन को प्लॉट में विभाजित कर 40 हजार रुपये प्रति प्लॉट की दर से 30 साल की लीज पर आवंटित किया गया।हालांकि 2007 तक केवल 228 प्लॉट ही आवंटित हो सके, यानी सभी सदस्यों को जमीन नहीं मिल पाई।
नियमों की अनदेखी का आरोप
कौटिल्य नगर में जमीन आवंटन की एक अहम शर्त यह थी कि केवल उन्हीं सांसदों-विधायकों को प्लॉट मिलेगा जिनके नाम पटना में पहले से कोई मकान न हो। आरोप है कि इस नियम का पालन नहीं किया गया। अब यदि यह साबित होता है कि लालू यादव के नाम महुआबाग में भी निजी संपत्ति है, तो कौटिल्य नगर का आवंटन नियमों के खिलाफ माना जा सकता है।
लीज खत्म, फिर भी कार्रवाई नहीं
सबसे बड़ा विवाद लीज की अवधि और उसके नवीनीकरण को लेकर है। 30 साल की लीज 31 दिसंबर 2017 को समाप्त हो चुकी थी, लेकिन इसके बाद भी वर्षों तक न तो नवीनीकरण हुआ और न ही कोई कानूनी कार्रवाई। करीब सात–आठ साल तक जनप्रतिनिधि बिना वैध अनुमति के वहां रहते रहे। अगस्त 2024 में जाकर नीतीश कुमार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने लीज की रकम दोगुनी करते हुए अगले 30 वर्षों के लिए नवीनीकरण किया।
उठे कई बड़े सवाल
अब इस पूरे मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
लीज नवीनीकरण में आठ साल की देरी क्यों हुई?
लीज की नई कीमत तय करने का आधार क्या था?
क्या यह कीमत बाजार दर के अनुरूप थी?
देरी के कारण क्या राज्य सरकार को राजस्व का नुकसान हुआ?
जिन जनप्रतिनिधियों के पास पहले से पटना में मकान थे, उनकी लीज क्यों रद्द नहीं की गई?
बढ़ सकती हैं लालू यादव की मुश्किलें
यह मामला केवल लालू प्रसाद यादव तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। यदि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के अनुरूप सख्ती से नियम लागू किए गए, तो कौटिल्य नगर में रहने वाले कई नेताओं के साथ-साथ लालू यादव के लिए भी कानूनी और राजनीतिक मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
