आस्था का ‘बाजार’ और पुलिस का ‘तमाशा’: क्या धर्मांतरण ही अब उत्तर प्रदेश की नई पहचान है?

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लखनऊ/आगरा: छांगुर बाबा का नाम अब इतिहास के पन्नों में दबने लगा है, लेकिन उनके नक्शेकदम पर चलते हुए उत्तर प्रदेश ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यहां ‘धर्मांतरण’ का धंधा पूरे जोर-शोर से फल-फूल रहा है। और इस बार तो कमाल ही हो गया! पुलिस बता रही है कि यह गैंग सीधे आतंकी संगठन ISIS मॉड्यूल की तर्ज पर काम करता है। क्या बात है! यानी, अब हमारे अपराधी भी ‘अंतर्राष्ट्रीय स्तर’ के हो गए हैं।

डीजीपी राजीव कृष्ण, एसटीएफ चीफ अमिताभ यश और आगरा पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार — ये तीनों बड़े नाम लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं और बताते हैं कि ये पूरा नेटवर्क ‘ब्रेन वॉश’ और ‘लव जिहाद’ पर आधारित है। क्या ये वाकई एक खुलासा है, या वर्षों की निष्क्रियता पर पर्दा डालने की एक कोशिश?

‘ब्रेन वॉश’ का नया कारोबार: आस्था, या सिर्फ़ एक ‘प्रोडक्ट’?

आगरा की दो सगी बहनों की कहानी से इस पूरे खेल का पर्दाफाश हुआ। 24 मार्च को ये बहनें घर छोड़कर चली जाती हैं। उनके पिता सदर थाने में गुमशुदगी की अर्जी देते हैं। पिता गिड़गिड़ाते रहे, पुलिस ‘कानून का राज’ दिखाती रही। पूरे 41 दिन लग गए इस ‘छोटे से’ मामले को अपहरण में बदलने में। 4 मई, 2025 को जाकर अपहरण का केस दर्ज होता है। क्या ये हमारी पुलिस की ‘तत्परता’ है, या उसकी ‘अंधेरगर्दी’? क्या किसी गरीब और आम आदमी को 41 दिन तक इंतज़ार करना होगा, तब जाकर हमारी पुलिस जागेगी? या डीजीपी राजीव कृष्ण, एसटीएफ चीफ अमिताभ यश और आगरा पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार जैसे ‘बड़े’ अधिकारियों को ही ऐसे मामलों की जानकारी मिलने पर ही कार्रवाई होती है? शायद हमें ‘ऊपर से आदेश’ का इंतज़ार करना ज़्यादा पसंद है, बजाय अपने कर्तव्यों को निभाने के।

पुलिस की शुरुआती जांच में पता चला कि दोनों बहनें ‘धर्मांतरण की मुहिम’ से जुड़ गई हैं। ठीक वैसे ही, जैसे फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ में दिखाया गया था। क्या हमारी पुलिस को अब फिल्मों से प्रेरणा लेनी पड़ती है? क्या हमारे समाज में इतनी गहराई तक ये जाल बिछ चुका है कि हमें इसकी जानकारी फिल्मों से मिलती है, पुलिस के खुफिया तंत्र से नहीं?

अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग और AK-47 वाली ‘आयशा’: क्या ये सिर्फ़ धर्मांतरण है, या कुछ और?

इस गैंग को लेकर जो पांच ‘अहम’ बातें पुलिस ने बताई हैं, वे और भी चौंकाने वाली हैं:

लव जिहाद का ‘आधुनिक अवतार’: ये गैंग लड़कियों को ‘लव जिहाद’ में फंसाकर धर्म परिवर्तन कराता, फिर निकाह करवा देता था। लड़कों को दौलत और ऐशो-आराम का लालच देता था। यानी, ‘प्रेम’ भी अब एक ‘सौदा’ बन गया है। और इस सौदे में सबसे पहले धर्म बदला जाता है। क्या हमारी युवा पीढ़ी इतनी कमज़ोर है कि पैसों और ऐशो-आराम के लिए अपनी आस्था भी बदल देगी? या उन्हें ‘ब्रेन वॉश’ करके ऐसा करने पर मजबूर किया जा रहा है?

इंटरनेशनल ‘डोनर्स’ का खेल: डीजीपी साहब बताते हैं कि धर्मांतरण के लिए यूएस, दुबई और कनाडा से फंडिंग हो रही थी। एक सोर्स तो कनाडा से भी मिला है। यानी, धर्मांतरण अब सिर्फ़ एक ‘स्थानीय समस्या’ नहीं, एक ‘अंतर्राष्ट्रीय व्यापार’ है। क्या हमारे देश की सुरक्षा एजेंसियां इस ‘व्यापार’ को सालों से होने दे रही थीं? क्या हमें विदेशी फंडिंग पर नज़र रखने के लिए कोई ‘विशेष चश्मा’ चाहिए, जो अब तक किसी के पास नहीं था?

ISIS कनेक्शन और AK-47: पुलिस ने जिन 10 लोगों को गिरफ्तार किया है, उनमें आयशा नाम की एक युवती भी है, जिसकी AK-47 के साथ सोशल मीडिया पर तस्वीर मिली है, और वह ISIS मॉड्यूल का हिस्सा रही है। अब सवाल ये है कि क्या हम देश में बैठे-बैठे ISIS का ‘स्वागत’ कर रहे थे? क्या ये सिर्फ़ धर्मांतरण है, या आतंकवाद की नई नर्सरी? क्या हमारी सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक हो रही थी, और हमें पता ही नहीं चला?

पहचान छुपाकर ‘धंधा’: ये सभी अपनी पहचान छुपाकर काफी लंबे समय से धर्मांतरण करवाते थे। क्या हमारी ‘पहचान’ इतनी सस्ती है कि कोई भी उसे ‘बदल’ कर, ‘बदला’ हुआ रूप लेकर ऐसे अपराधों को अंजाम देता रहे? और हमारी व्यवस्था क्या कर रही थी?

‘सैकड़ों’ धर्मांतरण, सैकड़ों सवाल: डीजीपी राजीव कृष्ण ने कहा है कि अब तक की जानकारी के मुताबिक, इन लोगों ने सैकड़ों लोगों के धर्मांतरण करवाए हैं। सैकड़ों! ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, ये उन परिवारों की कहानियां हैं, जिनकी आस्था और जीवन बदल दिए गए। क्या हम सिर्फ पकड़े गए ‘मोहरों’ से संतुष्ट हो जाएंगे, या ‘ऊपर’ के लोगों तक पहुंचेंगे?

जब मामला डीजीपी राजीव कृष्ण तक पहुंचा, तो ‘जादू’ हुआ। पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने खुद मामले को देखना शुरू किया। एडीसीपी सिटी आदित्य के नेतृत्व में 7 टीमें बनाई गईं। सर्विलांस और साइबर सेल को लगाया गया। यानी, जब ‘ऊपर’ से आदेश आता है, तभी हमारी पुलिस ‘अल्टीमेट एक्शन’ मोड में आती है। वरना, एक आम आदमी के लिए तो ’41 दिन का इंतज़ार’ ही उसका नसीब होता है।

टीमों ने बंगाल, गोवा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड में 11 जगहों पर छापेमारी की। बैरकपुर से शेखर रॉय उर्फ हसन अली, गोवा से आयशा (एसबी कृष्णा), कोलकाता से अली हसन उर्फ शेखर रॉय और ओसामा, आगरा से रहमान कुरैशी, मुजफ्फरनगर से अब्बू तालिब, देहरादून से अबुर रहमान, जयपुर से मोहम्मद अली और जुनैद कुरैशी को गिरफ्तार किया गया।

पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार किए गए 10 आरोपियों में कई हिंदू थे, जो धर्मांतरण करके मुस्लिम बन गए थे और बाद में इसी गैंग का हिस्सा बन गए। ये ‘उदारता’ और ‘खुली सोच’ का कौन सा पाठ है, जिसमें लोग पहले खुद का धर्म बदलते हैं, फिर दूसरों का बदलने का ‘धंधा’ करते हैं?

सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि गिरफ्तार किए गए 10 आरोपियों में कई हिंदू थे, जो धर्मांतरण करके मुस्लिम बन गए थे। बाद में यही लोग उसी गैंग का हिस्सा बन गए और लड़के-लड़कियों को धर्मांतरण करके मुस्लिम बनाने लगे। यानी, ‘ब्रेन वॉश’ सिर्फ़ एक तरफा नहीं था, ये एक ‘चेन रिएक्शन’ था। पहले आप शिकार बनिए, फिर शिकारी। क्या कमाल का ‘मॉडल’ है!

क्या यह ‘धर्मांतरण’ का एक संगठित ‘कारोबार’ है, जिसमें धर्म सिर्फ एक ‘उत्पाद’ है जिसे बेचा जा रहा है? या यह ‘सैकड़ों’ लोगों की ‘आस्था’ का ऐसा दुरुपयोग है, जिसे हम अपनी ‘धर्मनिरपेक्षता’ की आड़ में अनदेखा कर रहे हैं? और जब तक ‘बड़ी मछलियां’ सुरक्षित रहेंगी, क्या हम सिर्फ ‘छोटी मछलियों’ को पकड़कर ही ‘वाहवाही’ लूटते रहेंगे? ये सवाल हैं, और जवाब शायद किसी के पास नहीं हैं। या फिर कोई जवाब देना ही नहीं चाहता। आखिर, ‘जवाबदेही’ भी तो एक ‘पुरानी बात’ हो चुकी है, है न?

-मोहम्मद शाहिद की कलम से

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