आगरा। यह 17 साल का सोनू है—जिसकी उम्र से कहीं ज़्यादा भारी उसकी ज़िंदगी है। तीन साल पहले एक सड़क हादसे ने उससे मां-बाप दोनों छीन लिए। आज न घर है, न छत और न कोई स्थायी सहारा। महात्मा गांधी मार्ग के फुटपाथ पर लगभग बुझ चुकी आग के पास बैठा सोनू अपने बदन में बची-खुची गर्मी समेटने की कोशिश करता है। दिन में तीन पहिया साइकिल से भीख मांगता है, रात में ठंड से जूझता है यही उसकी पूरी दुनिया है।
सोनू की आवाज़ में दर्द साफ झलकता है। “मां-बाप खत्म हो गए… इसी वजह से यहां पड़े हैं। दोनों पैर एक्सीडेंट में खराब हो गए। किसी ने नहीं सुनी। बहुत वीडियो बने, बोले गाड़ी मिलेगी कुछ नहीं मिला। आश्रम वाले रात में ले जाते हैं और सुबह चार बजे भगा देते हैं। नगर निगम की गाड़ी आती है, लेकिन सुनवाई नहीं होती। रात आग जलाकर काटते हैं, दिन में पेट के लिए मांगने निकल जाते हैं।”
यह कहानी सिर्फ सोनू की नहीं है। आगरा की सड़कों पर ऐसे सैकड़ों चेहरे हैं, जो खुले आसमान के नीचे हर रात ‘पूस की रात’ झेलते हैं। जब अलाव की आग बुझ जाती है, तो बस एक ही दुआ बचती है “किसी तरह सो जाओ, शायद रात कट जाए।”
118 साल पहले भी ठंड ऐसी ही थी और आज भी वैसी ही है। तब मुंशी प्रेमचंद के पात्र हल्कू खेत में ठंड से लड़ रहे थे, और आज शहर के बीचों-बीच फुटपाथ पर बेघर, बेबस लोग ज़िंदगी बचाने की जंग लड़ रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि खेत की कहानी अब सड़क किनारे आ खड़ी हुई है। हाड़ कंपा देने वाली ठंड, ठंडी पड़ती अलाव की तपिश और हर गुजरते पल के साथ शरीर में उतरती सिहरन उम्मीदें राख बनती जा रही हैं।
वक़्त बदला है, पर पीड़ा नहीं। फुटपाथ पर सिकुड़े शरीर, कांपती सांसें और तेज़ रफ्तार गाड़ियों के बीच लटकती ज़िंदगियां सुबह तक जिंदा रह जाना किसी जंग जीतने से कम नहीं।
ठंड से बचाव के लिए आगरा नगर निगम की ओर से रैन बसेरों का दावा किया जाता है। कहा जाता है कि रात में सड़क किनारे मिले हर असहाय व्यक्ति को रैन बसेरे तक पहुंचाया जाता है, जहां ठहरने और भोजन की व्यवस्था है। नगर निगम टास्क फोर्स से जुड़े रिटायर्ड सूबेदार अशोक सिंह के अनुसार,
“जो भी गरीब असहाय सड़क पर सोता मिलता है, उसे उठाकर रैन बसेरे लाया जाता है। आदेश है कि कोई भी व्यक्ति रोड पर न मिले। पहले 12 रैन बसेरे थे, अब 28 हो चुके हैं, तीन नए और बनाए गए हैं।”
दावे अपनी जगह हैं, लेकिन हकीकत आज भी सड़कों पर कांपती दिखती है। कहीं जगह कम पड़ जाती है, तो कहीं नियम इतने सख्त कि सुबह होते ही लोग फिर फुटपाथ पर लौट आते हैं।
118 साल पहले सवाल उठा था क्या हल्कू की हार सिस्टम की हार थी? आज भी आगरा की सड़कों पर वही सवाल ज़िंदा है। आखिर ‘पूस की रात’ अब तक क्यों ज़िंदा है? और क्या सिस्टम और इंसानियत आज भी ठंड में सो रही हैं?
साभार— वरिष्ठ पत्रकार श्री अरविंद शर्मा गुड्डू जी की फेसबुक वॉल से
