संविधान निर्माण के ‘अनछुए’ पहलुओं पर आगरा में संवाद: डॉ. राजा राम ने संविधान सभा के गठन और डॉ. आंबेडकर की भूमिका पर उठाए सवाल

Press Release

संविधान की प्रस्तावना आंबेडकर के नहीं, नेहरू के भाषण से की गई थी तैयार

संविधान सभा के लिए निर्मित चार मुख्य कमेटियों में से किसी में भी शामिल नहीं थे डॉ. आंबेडकर

लोकतंत्रिक तरीके से नहीं किया गया संविधान सभा का चुनाव, तत्कालीन सात लाख गाँवों का कोई प्रतिनिधि नहीं था संविधान सभा में शामिल: डॉ. राजा राम

अल्पसंख्यक सवर्ण वर्ग संविधान सभा में रहा बहुसंख्यक, जबकि बहुसंख्यक अवर्ण (शूद्र) वर्ग संविधान सभा में रहा अल्पसंख्यक

76 वें गणतंत्र दिवस के खास मौके पर संविधान निर्माण की सच्चाई को उजागर कर जन जागरूकता हेतु ‘संविधान निर्माण के अनछुए पहलुओं’ पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया, शिक्षित नागरिकों और युवाओं के साथ वंचित वर्ग संगठन ने यूथ हॉस्टल में किया संवाद का आयोजन

आगरा। 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के बाद हम 76 वें गणतंत्र दिवस की दहलीज पर लोकतंत्र का उत्सव मनाने के लिए फिर तैयार हैं, पर विचारणीय यह है क्या यह वास्तव में ‘लोक’ का ‘तंत्र’ है? क्या संविधान में ‘लोक’ की भागीदारी है? क्या संविधान के निर्माण में ईमानदारी से हर वर्ग का प्रतिनिधित्व हुआ?

राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़े ऐसे ही कुछ बेहद महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर देने के साथ संविधान निर्माण की असल सच्चाई को उजागर कर जन-जन को जागरूक करने के उद्देश्य से शनिवार को यूथ हॉस्टल में वंचित वर्ग संगठन द्वारा लोकतंत्र के सशक्त स्तंभ मीडिया, शिक्षित नागरिकों और युवाओं के साथ एक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

वंचित वर्ग संगठन के संस्थापक-संयोजक डॉ. राजाराम ने बताया कि जवाहर लाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर, 1946 को दिये गए भाषण के आधार पर संविधान सभा का प्रस्ताव और उद्देश्य तैयार किया गया था। इसके पीछे डॉ. आंबेडकर की कोई भूमिका नहीं थी। संविधान सभा के निर्माण के लिए बनाई गई मुख्य चार कमेटियों में से दो कमेटियों के अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू और दो कमेटयों के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल थे। इनमें से किसी कमेटी में डॉ. आंबेडकर शामिल नहीं थे।

संविधान सभा की बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वयं यह कहा था कि संविधान निर्माण में जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रमुख भूमिका रही है।

डॉ. राजा राम ने बताया कि संविधान निर्मात्री सभा में देश के उद्योगपति, पूँजीपति, जमीदार, जागीरदार, तालुकेदार और राजा-महाराजा शामिल रहे। देश की जनसंख्या में बहुसंख्यक मजदूर, किसान, गरीब और हाशिये के लोग संविधान सभा से वंचित रहे।

उन्होंने कहा कि संविधान सभा का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से नहीं किया गया। तत्कालीन सात लाख गाँवों का कोई प्रतिनिधि संविधान सभा में शामिल नहीं था।

सन 1931 की जनगणना के आधार पर जिन लोगों को मतदान का अधिकार दिया गया, वह देश का उच्च वर्ग था। देश के मात्र 11.5 फ़ीसदी लोगों की ही मतदान में भागीदारी रही।

उन्होंने स्पष्ट किया कि मताधिकार के लिए शिक्षा, संपत्ति और करदाता होना आवश्यक शर्त रखा गया ताकि ऐतिहासिक रूप से शिक्षा और संपत्ति से वंचित अवर्ण (शूद्र) वर्ग मतदान में शामिल ही न हो सके। इस प्रकार यह बहुसंख्यक वर्ग संविधान सभा में अल्पसंख्यक रहा, जबकि अल्पसंख्यक सवर्ण वर्ग संविधान सभा में बहुसंख्यक हो गया। परिणाम यह हुआ कि बहुसंख्यक सवर्ण वर्ग ने अपनी रीति-नीति और हित के अनुसार ही भारतीय संविधान का निर्माण किया।

उन्होंने बताया कि डॉ. भीमराव आंबेडकर मताधिकार में शामिल होने वाले अपनी पार्टी के अकेले सदस्य थे फिर भी एक साजिश के तहत डॉ. आंबेडकर को संविधान का निर्माता प्रचारित किया गया ताकि अवर्ण (शूद्र) वर्ग अपने मानवाधिकारों की पहचान कर संविधान बनाने वालों के प्रति विरोध की कोई आवाज न उठा सके और डॉ. आंबेडकर को निर्माता मानकर संतुष्ट बना रहे।

डॉ. आंबेडकर को संविधान के मूल मसौदे में फेर बदल का नहीं था अधिकार

9 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई। जब लगभग पूरा संविधान बन गया, तब 29 अगस्त, 1947 को संविधान का अंतिम मसौदा बनाने के लिए संविधान सभा द्वारा डॉ. आंबेडकर की अध्यक्षता में ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन किया गया।

डॉ. राजाराम ने बताया कि संविधान सभा के सदस्यों ने संविधान के मूल मसौदे के लिये जो भी सिद्धान्त तय किये थे, उन्हीं के आधार पर सर वी०एन० राव के द्वारा मूल मसौदा तैयार करवा लिया गया।

सर वी०एन० राव द्वारा तैयार किया गया मूल मसौदा डॉ० बी०आर० अम्बेडकर की अध्यक्षता वाली ड्राफ्टिंग कमेटी को अक्टूबर 1947 के अंतिम सप्ताह में इस शर्त के साथ सोंपा गया कि आप इसमें कोई फेर-बदल न करके संविधान का अंतिम मसौदा तैयार कर दें। इस तरह वही मूल मसौदा बिना फेर बदल किए, भारत का संविधान बना।

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