Agra News: सलीम चिश्ती दरगाह पर बिखरी ‘बसंती’ रूहानियत; हज़रत बाले मियां के उर्स में सरसों के फूलों के साथ गूंजी अमीर ख़ुसरो की बसंत

Press Release

आगरा। हज़रत ताजुद्दीन चिश्ती उर्फ़ बाले मियां रहमत का उर्स इस बार वसंत उत्सव की रूहानी खुशबू के साथ पूरे अकीदत और अदब से मनाया गया। हज़रत सलीम चिश्ती की दरगाह पर जैसे ही उर्स की रस्में शुरू हुईं, पूरा परिसर सरसों के फूलों, पीले पटकों, इत्र की खुशबू और सूफ़ियाना संगीत से बसंती रंग में रंग गया। माहौल में आस्था भी थी, सुर भी और वही गंगा-जमुनी तहज़ीब भी, जो आगरा की पहचान रही है।

दरगाह के सज्जादा नशीन पीरज़ादा अरशद फरीदी ने सैकड़ों मुरीदों के साथ बाले मियां की मजार पर संदलपोशी की। इस दौरान देश की खुशहाली, अमन और तरक्की के लिए विशेष दुआ की गई। उर्स के साथ ही दरगाह में वसंत उत्सव की शुरुआत भी मानी जाती है, जो परंपरा के अनुसार सात दिनों तक मनाया जाता है।

बसंत की रस्मों में सरसों के फूल अकीदत के साथ पेश किए गए। बड़ी संख्या में अकीदतमंद पीले पटके पहनकर दरगाह पहुंचे और बसंत की खुशी में शामिल हुए। पीले रंग की छटा और सूफ़ियाना रूहानियत ने पूरे माहौल को खास बना दिया।

कार्यक्रम में सूफ़ी क़व्वाल सलीम और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त दास्तानगो सैय्याद साहिल आगा ने अमीर ख़ुसरो की बसंत परंपरा को दास्तानगोई और क़व्वाली के जरिए जीवंत किया। उनकी प्रस्तुति ने बसंत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थ को दर्शकों के सामने प्रभावी ढंग से रखा।

इस अवसर पर दिल्ली दूरदर्शन की एंकर सादिया अलीम और वरिष्ठ पत्रकार अली आदिल खान भी मौजूद रहे, जिनकी उपस्थिति से आयोजन की गरिमा बढ़ी। खास बात यह रही कि कार्यक्रम में हिंदू और मुस्लिम समाज के सैकड़ों लोगों ने एक साथ भागीदारी की, जो सांझी संस्कृति की मजबूत तस्वीर बनकर सामने आई।

उल्लेखनीय है कि अमीर ख़ुसरो की बसंत परंपरा भारतीय संस्कृति की एक अनमोल धरोहर मानी जाती है। सूफी संतों ने संगीत, कविता और ऐसे उत्सवों के माध्यम से समाज को जोड़ने का काम किया और यही परंपरा आज भी दरगाहों में उसी श्रद्धा और शिद्दत के साथ निभाई जा रही है।

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