समानता या नया विवाद? यूजीसी के प्रस्तावित भेदभाव विरोधी नियमों पर क्यों छिड़ी है बहस, जानें मुख्य बिंदु

अन्तर्द्वन्द

बृजेश सिंह तोमर
(वरिष्ठ पत्रकार एवं आध्यात्मिक चिंतक)

उच्च शिक्षा केवल डिग्री देने की व्यवस्था नहीं, बल्कि समाज के बौद्धिक और नैतिक निर्माण का आधार है। ऐसे में विश्वविद्यालयों से जुड़े किसी भी नियमन का असर कक्षा से आगे बढ़कर समाज की संरचना और रिश्तों तक जाता है। यूजीसी के प्रस्तावित नए नियमों को लेकर उठ रही बहस इसी कारण महज प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक और सामाजिक विमर्श का विषय बन गई है।

यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की घटनाएँ हुई हैं और उन्हें रोकना राज्य का दायित्व है। संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 21 राज्य को यह जिम्मेदारी सौंपते हैं कि वह कमजोर वर्गों की गरिमा और समान अवसर सुनिश्चित करे। परंतु लोकतंत्र में किसी भी कानून की मजबूती केवल उसकी नीयत से नहीं, उसकी प्रक्रिया से भी मापी जाती है।

यही वह बिंदु है जहाँ प्रस्तावित मसौदे पर सवाल उठ रहे हैं।
सबसे पहली चिंता इसकी भाषा और परिभाषाओं को लेकर है। “भेदभाव”, “उत्पीड़न” और “अनुचित व्यवहार” जैसे शब्दों का दायरा इतना व्यापक रखा गया है कि इरादे, संदर्भ और अकादमिक निर्णय के बीच फर्क करना मुश्किल हो सकता है। कानून का मूल सिद्धांत है कि अस्पष्टता मनमानी को जन्म देती है। यदि नियम स्पष्ट न हों, तो उनका लागू होना निष्पक्षता के बजाय व्यक्तिपरकता पर टिक जाता है।

दूसरा पहलू झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से जुड़ा है। किसी भी न्याय व्यवस्था में यह स्वीकार किया गया है कि कानून का दुरुपयोग भी अन्याय का ही रूप है। यदि किसी शिक्षक, अधिकारी या छात्र को केवल आरोप के आधार पर सामाजिक अपमान या प्रशासनिक कार्रवाई झेलनी पड़े, तो यह उसके सम्मान और जीवन के अधिकार को प्रभावित करता है। इसलिए संतुलन के लिए ऐसे मामलों में सुरक्षा प्रावधान भी उतने ही जरूरी हैं जितने संरक्षण के प्रावधान।

तीसरी चिंता प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की है। “दूसरे पक्ष को सुने बिना निर्णय न हो” यह केवल कानूनी तकनीक नहीं, बल्कि न्याय का मूल है। शिकायतकर्ता की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन आरोपी को निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध सुनवाई की गारंटी भी उतनी ही आवश्यक है। किसी भी एक पक्ष पर अधिक झुकाव व्यवस्था को असंतुलित बना सकता है।

प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि समान अवसर समितियाँ या अन्य तंत्र बनाए जाते हैं, तो उनमें विविध सामाजिक वर्गों की भागीदारी विश्वास पैदा करती है। कानून केवल संरक्षण नहीं देता, उसे भरोसा भी पैदा करना चाहिए। प्रतिनिधित्व का असंतुलन नियमों को एकतरफा होने की छवि दे सकता है।

एक बड़ा और दूरगामी मुद्दा अकादमिक स्वतंत्रता का है। विश्वविद्यालय विचारों के मुक्त आदान-प्रदान की जगह हैं। आलोचना, मूल्यांकन और असहमति शिक्षा की आत्मा हैं। यदि हर अकादमिक निर्णय संभावित कानूनी जोखिम बन जाए, तो शिक्षक विवेक से नहीं, भय से निर्णय लेने लगेंगे। इससे शिक्षा का माहौल रचनात्मक के बजाय सतर्क और सीमित हो सकता है।

इसके साथ सामाजिक असर का सवाल भी जुड़ा है। कानून यदि संतुलित न हो तो वह न्याय की जगह ध्रुवीकरण पैदा कर सकता है। सामाजिक न्याय का लक्ष्य किसी एक वर्ग को ऊपर उठाना नहीं, बल्कि समाज में समरसता बनाना है। यदि नियम संवाद के बजाय टकराव को बढ़ाएँ, तो उनका उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।

अपील और पुनरीक्षण की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव भी व्यावहारिक समस्या है। किसी भी प्रशासनिक कानून में स्वतंत्र अपील तंत्र भरोसे की रीढ़ होता है। इसकी अस्पष्टता नियमों को और विवादास्पद बना सकती है।

इन तमाम चिंताओं के बावजूद यह भी सच है कि मसौदे की मंशा भेदभाव रोकने की है, जो आवश्यक और स्वागतयोग्य है। पर मंशा और संरचना में संतुलन जरूरी है। स्पष्ट परिभाषाएँ, झूठी शिकायतों पर प्रावधान, प्राकृतिक न्याय की गारंटी और संतुलित प्रतिनिधित्व जोड़कर इस मसौदे को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

इतिहास बताता है कि असंतुलित कानून समाज को जोड़ने के बजाय बाँट सकते हैं। यदि सचमुच समावेशी और न्यायपूर्ण शिक्षा व्यवस्था बनानी है, तो संवाद, सुधार और संतुलन का रास्ता अपनाना होगा। तभी नियम भरोसा भी जगाएँगे और न्याय भी सुनिश्चित करेंगे।

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