फेक ब्रेकिंग की दौड़ में मीडिया की गिरती साख…

अन्तर्द्वन्द

बृजेश सिंह तोमर
(वरिष्ठ पत्रकार एवं आध्यात्मिक चिंतक)

कभी समाचार माध्यमों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, क्योंकि वे समाज को दिशा देते थे, सत्ता से सवाल करते थे और जनता तक सत्य पहुंचाते थे। लेकिन टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के विस्तार के बाद “सबसे पहले खबर दिखाने” की अंधी होड़ ने मीडिया की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई है। रफ्तार की इस प्रतिस्पर्धा ने सच्चाई की जगह सनसनी को और जिम्मेदारी की जगह जल्दबाजी को खड़ा कर दिया है।

हालांकि प्रिंट मीडिया अभी भी इस फेक न्यूज़ की दौड़ से अपेक्षाकृत दूर है, क्योंकि वहां खबर की पुष्टि के लिए समय और प्रक्रिया दोनों मौजूद हैं।

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें आज तक की एंकर अंजना ओम कश्यप की तस्वीर पर श्रद्धांजलि दी जा रही थी। पहली नज़र में यह किसी दुखद घटना का दृश्य लगा, लेकिन बाद में पता चला कि यह एक प्रतीकात्मक व्यंग्य था। श्रद्धांजलि देने वाला व्यक्ति अभिनेता धर्मेंद्र का प्रशंसक था, जिसने कहा— “जब धर्मेंद्र की मौत की झूठी खबर चल सकती है, तो फिर इनकी क्यों नहीं?” यह वाक्य उन चैनलों के लिए सीधा तमाचा था जो बिना सत्यापन के खबरों का प्रसारण कर देते हैं।

यह कोई पहला मामला नहीं है। कुछ समय पहले कई प्रतिष्ठित चैनलों ने अभिनेता धर्मेंद्र के निधन की झूठी खबरें ब्रेकिंग न्यूज बनाकर चला दी थीं। कुछ ही मिनटों में यह खबर पूरे देश में फैल गई। सोशल मीडिया पर लोग श्रद्धांजलि देने लगे, शोक संदेश पोस्ट करने लगे।

उधर, धर्मेंद्र अस्पताल के कमरे में बैठकर टीवी पर अपनी “मौत की खबर” देख रहे थे। यह दृश्य जितना हास्यास्पद था, उतना ही मीडिया की गिरती साख का प्रतीक भी।

स्थिति यहां तक पहुंच गई कि हेमा मालिनी, ईशा देओल और सनी देओल ने कड़ा आक्रोश जताया। किसी भी दृष्टि से यह मानवीय या जिम्मेदाराना व्यवहार नहीं कहा जा सकता।

दुर्भाग्य से यह प्रवृत्ति मनोरंजन जगत तक सीमित नहीं है। भारत-पाक तनाव के दौरान भी कई चैनलों ने बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के “युद्ध शुरू” जैसी खबरें चला दीं। ऐसी झूठी सूचनाओं ने देश में भय और भ्रम का माहौल बना दिया।
जब सच्चाई सामने आई, तब चैनलों ने सफाई दी— लेकिन तब तक झूठ कई दिमागों में अपनी जगह बना चुका था।

टीआरपी की इस अंधी दौड़ में यही खबरें सोशल मीडिया पर लाइक, कमेंट और फॉलोवर्स जुटाने का जरिया बन जाती हैं, और कई प्रतिष्ठित लेखक भी इन पर त्वरित टिप्पणियाँ कर बैठते हैं।

दरअसल, पत्रकारिता की दिशा बदल चुकी है। प्रिंट मीडिया सत्य के प्रति अधिक सजग बना हुआ है क्योंकि उसके पास पुष्टि का समय होता है, लेकिन टीवी मीडिया में टीआरपी का दबाव ज्यादा है।

आज संपादक यह नहीं पूछते कि— “खबर सही है या नहीं?” बल्कि पूछते हैं— “पहले किस चैनल ने चलाई?”

यही वह मोड़ है जहां पत्रकारिता, पत्रकारिता न रहकर मनोरंजन में बदल जाती है। “ब्रेकिंग न्यूज” एक प्रोडक्ट बन चुकी है और सच उसका ‘साइड इफेक्ट’।

मीडिया को समझना होगा कि जनता खबर नहीं, भरोसा खरीदती है। वह चैनल सत्य पाने के लिए देखती है, सनसनी के लिए नहीं। एक बार यह भरोसा टूट गया, तो हजार ब्रेकिंग न्यूज भी उसकी साख नहीं लौटा सकतीं।

समय आ गया है कि मीडिया अपनी प्राथमिकताएं तय करे। खबरें देर से आएं पर सही आएं। दर्शक को भ्रम नहीं, तथ्य मिलें। ब्रेकिंग से पहले खबर पूरी तरह वेरिफाई हो।

क्योंकि जब मीडिया सच कहने से चूक जाता है, तो समाज झूठ पर विश्वास करने लगता है— और यही सबसे खतरनाक स्थिति है।

पत्रकारिता का मूल धर्म सत्य की खोज है, न कि भ्रम का प्रसार। “फेक ब्रेकिंग” की इस होड़ में यदि मीडिया ने आत्ममंथन नहीं किया, तो वह एक दिन स्वयं अपनी विश्वसनीयता के ‘शोक संदेश’ को लिखने पर मजबूर हो जाएगा।

आज आवश्यकता है कि हर पत्रकार, हर संपादक, हर चैनल और सोशल मीडिया का हर पहरुआ यह संकल्प ले “खबर पहले नहीं, सही खबर दिखाऊँगा।”

सूचना तंत्र समाज की संवेदनाओं, सुरक्षा और मनोविज्ञान को क्षण भर में प्रभावित कर सकता है। इसलिए इसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। कुछ क्षण की देरी भले हो, पर प्रसारित हो तो सिर्फ सत्य।

हकीकत यही है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता गिरी है—
और यही छोटा-सा संकल्प उसकी खोई हुई साख को वापस ला सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *