26 साल का हुआ ‘बिग ब्रदर’, 62 देशों में फैला साम्रज्य, कैसे भारत पहुचा नाम बदल कर ‘बिग बॉस’, आज जानेगें सब कुछ

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नमस्कार, आज बात एक ऐसे शो की, जिसने हमारे और आपके ड्राइंग रूम में 24 घंटे की सीसीटीवी निगरानी वाला एक घर बसा दिया है. एक ऐसा घर, जहां हर लड़ाई, हर झगड़ा, हर आंसू, हर हंसी, हर गाली… सब कैमरे की आंखों से होकर हम तक पहुंचती है. एक ऐसा शो, जहां लोग अपनी ‘असली’ छवि दिखाने का दावा करते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सच में असली है? या फिर ‘असली’ के नाम पर ये एक और ‘फर्जी’ दुनिया है?

आज बात ‘बिग बॉस’ की नहीं, बल्कि उसके बड़े भाई ‘बिग ब्रदर’ की. वो शो, जिसकी कोख से ‘बिग बॉस’, ‘तमाशा घर’ और दुनिया के 60 से ज़्यादा शो पैदा हुए.

3 नवंबर 2006, भारत और ‘बिग बॉस’ का पहला कदम

भारत में ‘बिग बॉस’ का आगाज़ 3 नवंबर 2006 को हुआ. होस्ट थे अरशद वारसी. पहला सीज़न कुछ खास नहीं चला. फिर आईं शिल्पा शेट्टी. फिर अमिताभ बच्चन. शो को थोड़ी पहचान मिली, लेकिन असली किस्मत तो तब चमकी, जब चौथे सीज़न में सलमान खान ने एंट्री ली. फिर तो क्या कहना! सलमान आए, और हर सीज़न के साथ ‘बिग बॉस’ की टीआरपी आसमान छूने लगी. आज भी 19वें सीज़न में सलमान भाई ही हैं और पब्लिक भी बेशुमार प्यार लुटा रही है.

लेकिन, भारत में तो ये 2006 में आया. तो क्या उससे पहले लोग ‘बिग बॉस’ जैसे शो को नहीं देखते थे? क्या हमारे यहां 24 घंटे दूसरों की ज़िंदगी में झांकने का ये चस्का नया है? नहीं, ये चस्का तो पुराना है. बस इसका नाम ‘बिग ब्रदर’ है और इसका जन्म भारत में नहीं, बल्कि नीदरलैंड में हुआ था.

नीदरलैंड में ‘1984’ में हुआ जन्म

कहते हैं, ज़रूरत से ही आविष्कार होता है. लेकिन, क्या इंसानी ज़िंदगी में तांक-झांक करने की भी कोई ज़रूरत होती है? नीदरलैंड के टीवी प्रोड्यूसर जॉन डी मोल को 1997 में ऐसा ही एक ख्याल आया. वो एक ऐसा शो बनाना चाहते थे, जहां इंसान की असली शक्ल-सूरत दुनिया को दिखाई जा सके.

अब सवाल ये है कि उन्हें ये आइडिया कहां से मिला? जवाब है एक उपन्यास. जॉर्ज ऑरवेल का मशहूर उपन्यास ‘1984’. इस उपन्यास में एक काल्पनिक दुनिया है, जहां एक किरदार है ‘बिग ब्रदर’, जो हर इंसान पर 24 घंटे नज़र रखता है. इस किरदार का नारा था, ‘बिग ब्रदर इज वॉचिंग यू’ यानी ‘बिग ब्रदर’ आपको देख रहा है. बस इसी से प्रेरित होकर जॉन डी मोल ने एक ऐसा घर बनाया, जहां लोगों को 24 घंटे कैमरे की निगरानी में रखा जा सके.

16 सितंबर 1999, ‘बिग ब्रदर’ का पहला प्रसारण

दो साल की मेहनत के बाद, जॉन डी मोल का सपना सच हुआ. 16 सितंबर 1999 को ‘बिग ब्रदर’ नीदरलैंड में पहली बार टेलीकास्ट हुआ. शो का नाम भी वही रखा गया. ‘बिग ब्रदर’. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस शो में आने के लिए 3 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने आवेदन किया था, लेकिन सिर्फ 9 लोग चुने गए. बाद में 3 और कंटेस्टेंट को शामिल किया गया. इस तरह, पहले सीज़न में 12 कंटेस्टेंट थे.

ये 12 लोग बाहरी दुनिया से बिल्कुल कट जाते थे. 106 दिनों तक वो एक ऐसे घर में रहते थे, जहां 24 कैमरे लगे थे. उनका खाना-पीना, उठना-बैठना, लड़ना-झगड़ना… सब कुछ कैमरे में कैद होता था. हफ्ते-दर-हफ्ते एक-दूसरे को नॉमिनेट करके वो खुद को बचाते और दूसरों को घर से बाहर करते थे.

क्या ‘बिग बॉस’ के घर की तरह वहां भी खाने-पीने की सारी सहूलियतें मिलती थीं? नहीं. पहले सीज़न में तो कंटेस्टेंट को खुद ही खाना उगाना पड़ता था. जी हां, शो का फॉर्मेट ऐसा था कि उन्हें घर में ही सब्ज़ियां और फल उगाने पड़ते थे, ताकि कंटेस्टेंट के बीच सामाजिक तनाव बढ़ाया जा सके.
106 दिनों के इस सफर के बाद, 30 दिसंबर 1999 को शो का फिनाले हुआ. बार्ट इन टी वेल्ड नाम के कंटेस्टेंट को पहला विनर चुना गया. उन्हें इनाम में 5 लाख 20 हज़ार गिल्डर्स मिले, जो आज के हिसाब से करीब 2 करोड़ 56 लाख रुपये होते हैं.

बिग ब्रदर’ से ‘बिग बॉस’ तक का सफर

पहले ही सीज़न की सफलता ने ‘बिग ब्रदर’ को नीदरलैंड की सीमाओं से बाहर निकाल दिया. 5 जुलाई 2000 को ये शो अमेरिका में भी शुरू हुआ. फिर ऑस्ट्रेलिया, इटली, स्पेन और धीरे-धीरे 62 से भी ज़्यादा देशों में फैल गया.

कुछ देशों ने इसे ‘बिग ब्रदर’ के नाम से ही चलाया, तो कुछ ने नाम बदल दिए. भारत में ये ‘बिग बॉस’ बना और पाकिस्तान में ‘तमाशा घर’.

आज बनिजय एंटरटेनमेंट नाम की एक कंपनी के पास ‘बिग ब्रदर’ के राइट्स हैं और वो ही इसे दुनियाभर में डिस्ट्रीब्यूट करती है. सारे वर्जन को मिलाकर अब तक 500 से ज़्यादा सीज़न आ चुके हैं और 28 हज़ार से ज़्यादा एपिसोड बन चुके हैं.

क्या हम दूसरों की जिंदगी में ताक-झांक कर रहे हैं?

आज तक 7 हज़ार से ज़्यादा लोग इस शो का हिस्सा रह चुके हैं और 5 हज़ार से ज़्यादा लोग एविक्ट यानी घर से बाहर हो चुके हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि पिछले 26 सालों में ‘बिग ब्रदर’ ने एक बड़ा ग्लोबल फैन बेस बना लिया है.

लेकिन, सवाल ये है कि क्या हम टीवी के परदे पर दूसरों की ज़िंदगी को देखकर खुद को एंटरटेन कर रहे हैं? या फिर इस तरह के शो हमारी ज़िंदगी को भी एक ‘बिग बॉस’ के घर की तरह बना रहे हैं, जहां हर हरकत को रिकॉर्ड किया जा रहा है?

क्या टीवी पर दूसरे को लड़ते, झगड़ते, रोते देखकर हमें मज़ा आ रहा है? या फिर हम भी कहीं न कहीं इस शो के फॉर्मेट का हिस्सा बन गए हैं, जहां दूसरों की ज़िंदगी में झांकना ही हमारी एंटरटेनमेंट का एकमात्र तरीका है?

यह भी एक तरह का शो ही है, जहां पब्लिक एक तरफ होती है और कंटेस्टेंट दूसरी तरफ. और हम ये तय करते हैं कि कौन रहेगा और कौन जाएगा. पर क्या जिंदगी में भी ऐसा ही होता है? या हमें खुद सोचना पड़ेगा कि किस पर अपनी नज़र रखनी है और किससे अपनी नज़रें हटानी है?

नमस्ते…

-मोहम्मद शाहिद की कलम से

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