गुलाबी नगरी जयपुर में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन अमर कथा का भावविभोर वर्णन

Religion/ Spirituality/ Culture उत्तर प्रदेश

जयपुर। गुलाबी नगरी जयपुर के मरुलीपुरा देव नगर क्षेत्र में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के द्वितीय दिवस शनिवार को श्रद्धा, भक्ति और ज्ञान का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा वाचिका पं. गरिमा किशोरी जी के श्रीमुख से शुकदेव जन्म, राजा परीक्षित को श्राप तथा अमर कथा का अत्यंत भावपूर्ण और मार्मिक वर्णन किया गया।
कथा के दौरान पं. गरिमा किशोरी जी ने बताया कि नारद जी के कहने पर माता पार्वती ने भगवान शिव से उनके गले में विराजमान मुंडमाला के विषय में प्रश्न किया, भोलेनाथ ने बताया कि वह मुंडमाला किसी और की नहीं, स्वयं पार्वती जी के ही मुंडों की है, प्रत्येक जन्म में पार्वती जी जब भी देह त्याग करती हैं, शंकर जी उनके मुंडों को अपने गले में धारण कर लेते हैं, इस पर पार्वती जी ने हँसते हुए कहा “हर जन्म में क्या मैं ही मरती रही, आप क्यों नहीं?” तब भगवान शिव ने बताया कि उन्होंने अमर कथा का श्रवण किया है।
पार्वती जी के आग्रह पर भगवान शिव उन्हें अमर कथा सुनाने लगे। उस समय वहाँ शिव-पार्वती के अतिरिक्त केवल एक तोते का अंडा था, जो कथा के प्रभाव से फूट गया और उसमें से श्री शुकदेव जी का प्राकट्य हुआ। कथा सुनते-सुनते पार्वती जी निद्रा में लीन हो गईं। किंतु पूरी कथा श्री शुकदेव जी ने सुन ली और अमर हो गए। जब भगवान शिव को इसका ज्ञान हुआ तो वे श्री शुकदेव जी को मृत्युदंड देने के लिए उनके पीछे दौड़े, भागते-भागते श्री शुकदेव जी महर्षि व्यास जी के आश्रम पहुँचे और उनकी पत्नी के मुख से गर्भ में प्रविष्ट हो गए। बारह वर्षों के पश्चात श्री शुकदेव जी गर्भ से बाहर आए और इस प्रकार उनके दिव्य जन्म की कथा पूर्ण हुई।
कथा व्यास पं. गरिमा किशोरी जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा मनुष्य को विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से साक्षात्कार का मार्ग दिखाती है। राजा परीक्षित के कारण ही पृथ्वीवासियों को भागवत कथा श्रवण का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ, समाज द्वारा बनाए गए नियम समय के साथ बदल सकते हैं, किंतु भगवान के नियम न तो कभी गलत होते हैं और न ही बदले जा सकते हैं।
उन्होंने भागवत के चार अक्षरों का भावार्थ समझाते हुए बताया, भा से भक्ति, ग से ज्ञान, व से वैराग्य और त से त्याग। जो जीवन को इन चार गुणों से भर दे वही सच्ची भागवत है, साथ ही निष्काम भक्ति, भागवत के छह प्रश्न, भगवान के 24 अवतार, श्री नारद जी का पूर्व जन्म, राजा परीक्षित का जन्म, माता कुन्ती द्वारा सुख में भी विपत्ति की याचना तथा दुःख में गोविंद दर्शन के महत्व का सुंदर वर्णन किया गया।
कथा में पितामह भीष्म द्वारा जीवन की अंतिम बेला में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करते हुए देह त्याग, राजा परीक्षित को श्राप तथा उन्हें मुक्ति प्रदान करने हेतु भगवान श्री शुकदेव जी के प्राकट्य का भावपूर्ण प्रसंग सुनाया गया, जिसे सभी श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा भाव से श्रवण किया। कथा के दौरान पं. गरिमा किशोरी जी ने सुमधुर और भावपूर्ण भजनों की प्रस्तुति देकर भक्तों को भावविभोर कर दिया। इस पावन अवसर की प्रेरणा दिलीप कुमार एवं प्रकाश कुमार समस्त जेठवानी परिवार सहित श्रद्धालुजन उपस्थित रहे। समूचा वातावरण भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास से ओतप्रोत हो उठा।इस पावन मौके पर  अजय बंसल, भगवान जी, अमित कुमार, मुकेश यादव, सौम्या शर्मा, सतीश कुमार शर्मा, डॉ मिताली शर्मा, अशोक, ममताप्रदीप कुमार,योगेश,भरत कुमार, राहुल, राधा किशन, जितेंद्र, विजय, कपिल, शेखर, चंद्रप्रकाश, हेमा, नीलम, ज्योति, वर्षा, दीपा, लता, जाया, ऊषा, वीना, लीना, सावित्री, पुष्पा, आशा, सुनीता, भारती, खुशबु, वान्या, ममता, रानी, भावना, इंदु आदि लोग उपस्थित रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *