समीक्षा: “चूल्हे से चाँद तक” — चूल्हे की आँच से चाँद की कविता तक की यात्रा

समीक्षक: सोनल शर्मा, देहरादून प्रियंका सौरभ का यह काव्य संग्रह ‘चूल्हे से चाँद तक’ केवल कविता नहीं, स्त्री आत्मा की यात्रा है। यह वह आवाज़ है, जिसे सदियों से दबाया गया, पर वह फिर भी जलती रही – रोटियों के साथ, परातों के बीच, और आँसुओं में घुली स्याही के माध्यम से। इस संग्रह की […]

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मिलावट: शरीर ही नहीं, आत्मा को भी कर रहा है बीमार

मिलावट अब केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं रही, यह हमारे सोच, संबंध, और व्यवस्था तक में घुल चुकी है। मूँगफली में पत्थर हो या दूध में डिटर्जेंट, यह मुनाफाखोरी की संस्कृति का विस्तार है। उपभोक्ता की चुप्पी, सरकार की ढील और समाज की “चलता है” मानसिकता ने इसे स्वीकार्य बना दिया है। मिलावट एक नैतिक […]

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भारतीय पारिवारिक मूल्यों के पतन का आईना है ये हृदय स्पर्शी दास्तान

“पिता का पस्त मन और पुत्रों की पश्चिमी व्यस्तता” “एक पिता की विदाई, और समाज की परीक्षा” प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार लखनऊ के एक रिटायर्ड कर्नल ने अपने बेटों को एक मार्मिक पत्र लिखकर आत्महत्या कर ली। दोनों बेटे अमेरिका में बसे थे और मां की मृत्यु पर भी पूरी संवेदनशीलता नहीं […]

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दिल्ली में साँसों पर संकट, पर हरियाली ने जगाई उम्मीद…!

इंटीरियर डेकोरेशन में वास्तविक हरियाली बनी पहली पसंद… दिल्ली की ओर रुख करते हुए मन में एक ही प्रश्न बार-बार कौंधता रहा—क्या इस बार भी वही धूल-धुआँ और दमघोंटू हवा स्वागत करेगी? बीते कुछ वर्षों से दिल्ली की हवा जहरीली होती जा रही है, और आंकड़े इसकी भयावहता की पुष्टि भी करते हैं। अक्टूबर से […]

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योगम् शरणम् गच्छामि: मनोजन्य दैहिक बीमारियों से मुक्त होने के लिए योग है जरूरी

आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने जितनी खराबियां बटोरी हैं उस कारण मानवी मन मस्तिष्क के सम्मुख आज अनेक समस्याएं तथा चुनौतियां उपस्थित हुई हैं। खासकर पाश्चात्य जीवन शैली और रहन सहन ने मानव को मानसिक तनाव एवं अंतहीन पीड़ा के दलदल में धकेला है। इसके साथ ही तकनीकी प्रगति के भयावह जानलेवा वेग के […]

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प्रेम, प्रतिष्ठा और पीड़ा की त्रयी: ‘राज सर आईपीएस’ की मार्मिक गाथा

“प्रेम, पीड़ा और प्रश्नों की गाथा: ‘राज सर आईपीएस’” “जब व्यवस्था प्रेम को निगल गई: मंजू वर्मा की आत्मकथा पर एक दृष्टि” एक अधूरी कहानी का दस्तावेज: ‘राज सर आईपीएस’ प्रियंका सौरभ प्रेम की सबसे सच्ची परीक्षा तब होती है जब वह समय, समाज और सत्ता की सख्त दीवारों से टकराता है। ‘राज सर आईपीएस’ […]

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भविष्य बताने वाले, वर्तमान से बेख़बर क्यों: देश में इतने बड़े-बड़े भविष्य वक्ता… फिर भी किसी बड़े हादसे की ख़बर तक नहीं मिलती?

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार जब आपदा आई और बाबा ऑफलाइन थे जो लोग दावा करते हैं कि उनका “ऊपर वाले से सीधा संपर्क” है, वे हर बड़ी आपदा, दुर्घटना या संकट के समय चुप क्यों हो जाते हैं? क्या उनका दिव्य नेटवर्क केवल चढ़ावे और चमत्कार तक सीमित है? यह लेख उन […]

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योग: मन की शुद्धि से मोक्ष तक का मार्ग

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार मन ही सब कुछ है – यही योग का मूल मंत्र है। मन की शुद्धि, आत्म-चिंतन और संतुलन से ही जीवन में स्थिरता और शांति आती है। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मन, आत्मा और चेतना को जोड़ने की विद्या है। आज के तनावपूर्ण समय में, योग […]

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CET की डेट एक्सटेंशन का दिखावा, महज 48 घण्टे बढे, कौन जिम्मेदार है इस टॉर्चर के लिए?

“डिजिटल इंडिया” का सपना दिखाने वालों के खुद के पोर्टल इस्तेमाल के वक़्त क्यों हो जाते है ठप्प? सरल पोर्टल की असफलता: हरियाणा के युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ सर्टिफिकेट कहाँ से लाएं? प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार हरियाणा में आज जो हालात हैं, वहां डिजिटल नहीं, टॉर्चर इंडिया का निर्माण हो रहा […]

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पुस्तक समीक्षा: “मौन की मुस्कान” – चुप्पियों के शब्दों में गूंजती स्त्री की आत्मा

“मौन की मुस्कान” केवल कविताओं का संग्रह नहीं, एक स्त्री की आत्मा से निकली आवाज़ है। प्रियंका सौरभ की रचनाएँ जीवन, प्रेम, संघर्ष, और सामाजिक अन्याय को गहरे संवेदनात्मक और वैचारिक धरातल पर उठाती हैं। हर कविता मौन को भाषा और चुप्पी को प्रतिरोध में बदलती है। चाहे वह सरकारी स्कूलों की आवाज़ हो या […]

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