सरकारी तंत्र पर सवाल: टैक्स देने के बाद भी क्यों नहीं मिल रहीं बुनियादी सुविधाएँ?

देश का आम नागरिक हर साल अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को देता है, ताकि उसे सुरक्षित जीवन, बेहतर स्वास्थ्य-सेवाएँ, स्वच्छ हवा-पानी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और मजबूत बुनियादी ढाँचा मिल सके। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। लोगों के सामने आज भी वही समस्याएँ खड़ी हैं, जिन पर नियंत्रण […]

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विष को कौन पचाएगा? हमारी ज़िद, हमारी राजनीति… और हमारे फेफड़े…

भारत के शहर आज धुएँ की चादर में लिपटे हुए हैं। हर सुबह AQI के आँकड़े देखते ही दिल बैठने लगता है। यह वही देश है, जहाँ हम अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधाराओं को सही साबित करने में इतने तल्लीन हो चुके हैं कि साँसें बोझिल होने लगी हैं। हवा जहरीली हो रही है, फेफड़े भर रहे […]

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क्या हम अपने बच्चों को वह दृष्टि दे पा रहे हैं, जिसके आधार पर वे वर्तमान से बेहतर भविष्य बना सकें?

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार समाज परिवर्तन की सबसे कठिन, सबसे लंबी और सबसे महत्त्वपूर्ण यात्रा हमेशा अपने मूल में उन छोटे-छोटे बीजों से शुरू होती है, जिन्हें हम बच्चे कहते हैं। दुनिया की कोई भी क्रांति—विचारों की हो, नैतिकता की हो, तकनीक की हो या इंसानी मूल्यों की—तब तक स्थायी नहीं हो […]

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जयंती विशेष: पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी…एक असाधारण, बहुआयामी और अविस्मरणीय व्यक्तित्व

इंदिरा गांधी — यह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि ऐसा विराट व्यक्तित्व था जिसकी तुलना विश्व के किसी भी नेता से करना कठिन है। 19 नवंबर 1917 को इलाहाबाद के आनंद भवन में पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती कमला नेहरू के यहां जन्मी इंदिरा बचपन से ही असाधारण दृढ़ता, साहस और राष्ट्रभक्ति की प्रतीक थीं। […]

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संघ की भारत माता के हाथ में भगवा ध्वज… तिरंगा क्यों नहीं?

हाल ही में आरएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा घर–घर भारत माता की तस्वीरें और पंपलेट बांटे जा रहे हैं। इन चित्रों में भारत माता के हाथ में भगवा ध्वज दर्शाया गया है, जबकि राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगा होना चाहिए। इसको लेकर कई लोगों में सवाल और नाराजगी पैदा हो रही है। मेरा मानना है कि […]

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लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुचिता का प्रश्न और एसआईआर की अनिवार्यता

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार भारत में चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सबसे जीवंत उत्सव है। मतदान जनता को अपनी आवाज़ सुनाने और नीतिगत दिशा तय करने का अवसर प्रदान करता है। इस दौरान प्रशासन निष्पक्षता, सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक व्यवस्थाएँ करता है—मतदान केंद्रों की तैयारी […]

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फेक ब्रेकिंग की दौड़ में मीडिया की गिरती साख…

बृजेश सिंह तोमर(वरिष्ठ पत्रकार एवं आध्यात्मिक चिंतक) कभी समाचार माध्यमों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, क्योंकि वे समाज को दिशा देते थे, सत्ता से सवाल करते थे और जनता तक सत्य पहुंचाते थे। लेकिन टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के विस्तार के बाद “सबसे पहले खबर दिखाने” की अंधी होड़ ने मीडिया […]

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युगदृष्टा पंडित जवाहरलाल नेहरू : आधुनिक भारत के शिल्पकार

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित पंडित जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माणकर्ताओं में अग्रणी माने जाते हैं। वे न केवल स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे, बल्कि स्वतंत्र भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संरचना को दिशा देने वाले विश्वमान्य नेता भी थे। उनका जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद के […]

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अख़बारों में बच्चों के लिए जगह कहाँ?—खाली पन्नों पर बचपन की उपेक्षा का सवाल…

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार रविवार की सुबह बेटे प्रज्ञान को गोद में लेकर अख़बार से कोई रोचक बाल-कहानी पढ़ाने की इच्छा अधूरी रह गई। किसी भी प्रमुख अख़बार में बच्चों के लिए एक भी रचना नहीं थी। समाज बच्चों को पढ़ने के लिए कहता है, पर उन्हें पढ़ने को क्या देता है? […]

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मुस्कुरा रही है स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी: नफरत के खिलाफ जनता का फैसला

संजय पराते न्यूयॉर्क बंदरगाह के सामने खड़ी स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी ट्रंपियन अमेरिका की हार की घोषणा कर रही है। न्यूयॉर्क मेयर के चुनाव में जोहरान ममदानी की जीत मोदीयन इंडिया की हार की भी घोषणा है, क्योंकि ममदानी के चुनाव प्रचार में ट्रंप के लंगोटिया मित्र मोदी की आलोचना भी शामिल थी। अब मोदी और […]

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