भारत में मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता

Exclusive उत्तराखंड
भारत में मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता मौजूदा समय में काफी बढी है। पहले के लोगों को पता ही नहीं होता था कि मानवाधिकार क्या हैं। लेकिन आज देश की आधी से ज्यादा आबादी की मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी है। इसमें चाहे पुलिस उत्पीड़न के मामले हों या बंधुआ मजदूरों से संबंधित हों अथवा श्रमिकों के वेतन संबंधी मामले हों। सभी लोग जागरूक हो गये हैं। आलम यह है कि अगर किसी आरोप में एक व्यक्ति को पुलिस रात में उठाकर ले जाती है तो उसके परिजन सबसे पहले आला अफसरों को तो मैल या फैक्स करते ही हैं, साथ ही मानवाधिकार आयोग को जरूर सूचित करते हैं। अगर महिला उत्पीड़न की शिकायत है तो महिला आयोग के साथ ही मानवाधिकार आयोग को लोग जरूर रजिस्टर्ड डाक से शिकायती पत्र भेज देते हैं।
कुछ मामलों में मानवाधिकार आयोग काफी कारगर साबित हुआ है। जैसे पहले सिर पर मैला ढोने की परंपरा थी। इसको मानवाधिकार आयोग ने ही समाप्त कराया है। हालांकि अभी भी सफाईकर्मियों को प्रापर ड्रेस, ग्लब्स, सीवर में उतरने के लिये बूट्स की सुविधा पूरी तरह नहीं मिल पा रही है। इनको सामाजिक सुरक्षा भी नहीं मिल पा रही है। वेतन संबंधी मामलों को लेकर सफाईकर्मी समय-समय पर आंदोलन करते रहते हैं। वैसे पहले के मुकाबले अब काफी सुविधाएं दी जा रही हैं। जहां तक आगरा का सवाल है तो कोरोना के बाद से सफाई कर्मियों को मच्छरमार दवा छिड़कने के लिये तो मास्क तक दिये जा रहे हैं।  ग्लब्स तो पहले से ही दिये जाते हैं।
जेलों में मानवाधिकार के हिसाब से सुधारों की जरूरत
आगरा के जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस का कहना है कि उन्होंने कई बार आगरा जिला और सेंट्रल जेल में देखा है कि तमाम कैदी ऐसे हैं, जिनको शौच कराने के लिये भी दो कर्मियों की ड्यूटी लगायी जाती है। ऐसे कैदियों को न्यायालय के जरिये सरकार बाहर निकाल सकती है। उन्होंने बताया कि हमने मानवाधिकार आयोग को शिकायत भेजी थी कि वर्ष 2012 से लेकर 2017 के बीच जेलों में दो हजार कैदियों की मौत हर साल होती थी। इस पर मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया। इसके पश्चात जेल मैनुअल में भी बदलाव किया गया।
पुलिस प्रताड़ना के नाम पर मानवाधिकारों का उल्लंघन
 आरटीआई एक्टीविस्ट नरेश पारस का कहना है कि पुलिस द्वारा अपराधियों के पैर में गोली मारकर मानवाधिकारों का हनन किया जा रहा है। हर बार और हर अपराधी को मुठभेड़ में पैर में ही गोली क्यों लगती है। इन मामलों की शिकायत भी मानवाधिकार आयोग को की जा रही है। उन्होंने उम्मीद जतायी कि जल्द ही इस मामले में आयोग संज्ञान लेगा। उन्होंने कहा, हम कहते हैं कि अपराधी को उसके जुर्म की सजा मिले लेकिन न्यायालय भी तो बने हैं। वे जो सजा देते हैं, अपराधी कुबूल करते हैं।
मानवाधिकार आयोग ने झुग्गी झोंपड़ी वालों को भी सम्मान से जीने का अधिकार दिया है
मानवाधिकार आयोग ने झुग्गी झोंपड़ी में रहने वालों को भी सम्मान से जीने का अधिकार दिया है। सरकार की जिम्मेदारी है कि इनको स्वच्छ वातावरण मिले।पीने के लिये स्वच्छ जल हवा,प्रकाश की व्यवस्था करायी जाए।
नारी निकेतनों पर मानवाधिकार आयोग की नजर
किसी मामले में नारी निकेतन भेजी गयी महिलाओं को रहने सहने की उचित व्यवस्था मिले। इस पर भी मानवाधिकार आयोग की नजर रहती है। कई बार स्थानीय स्तर से शिकायत पहुंचने पर आयोग कार्यवाही करता है। हालांकि कभी-कभी शिकायत करने वालों केही खिलाफ स्थानीय प्रशासन हो जाता है। आरटीआई कार्यकर्ता नरेश पारस का कहना है कि कभी-कभी मानवाधिकार पर काम करने वालों को ही सरकार अपना दुश्मन मान लेती है। उन्होंने उदाहरण दिया कि एक बार आगरा में नारी निकेतन पर खबरें अखबारों में प्रकाशित करायी गयीं तो उनको तथा अखबार वालों को ही नोटिस थमा दिये गये।
कोई भी व्यक्त गरिमामय जीवन जीए यही मानवाधिकार की सच्ची परिभाषा
मानवाधिकारों पर लंबे समय से कार्य कर रहे नेत्रपाल सिंह का कहना है कि कोई भी व्यक्ति गरिमामय जीवन जीये, यही मानवाधिकार की सच्ची परिभाषा है। हालांकि वे यह मानते हैं कि समाज में पहले से काफी सुधार हुआ है। सिर पर मैला ढोने पर पाबंदी के साथ ही छूआछूत पर रोक लगी है। लेकिन अभी सामाजिक सुरक्षा पर काम होना बाकी है। श्री नेत्रपाल सिंह दिल्ली आदि बड़े शहरों में जाकर मानवाधिकार पर व्याख्यान देते हैं। इसके साथ ही पुस्तक आदि प्रकाशित कराकर समाज को मानवाधिकारों के प्रति सचेत कर रहे हैं।
मानवाधिकार की परिभाषा
  • मानवाधिकार वे मौलिक अधिकार हैं जो सभी मनुष्यों के अंतर्निहित मूल्य को मान्यता देते हैं।
  • ये अधिकार किसी सरकार द्वारा दिए या छीने नहीं जा सकते, बल्कि ये सार्वभौमिक और अविभाज्य हैं।
  • ये समानता और गरिमा पर आधारित हैं, जो विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और दर्शनों में समान रूप से प्रचलित हैं।
  • ये समाज में सभी के एक-दूसरे के साथ और राज्य के साथ संबंधों को परिभाषित करते हैं।
मानवाधिकार क्या होते हैं?
  • जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार: सबसे बुनियादी अधिकार, जो जीवन को जीने योग्य बनाता है।
  • गुलामी और यातना से मुक्ति: किसी को भी दासता या क्रूर और अमानवीय व्यवहार का सामना नहीं करना पड़ेगा।
  • विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: लोगों को अपनी राय व्यक्त करने और विश्वास रखने की आजादी है।
  • काम और शिक्षा का अधिकार: प्रत्येक व्यक्ति को काम करने और शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।
  • अन्य अधिकार: सामाजिक सुरक्षा, समान काम के लिए समान वेतन, और पर्याप्त जीवन स्तर का अधिकार भी शामिल है।
  • सांस्कृतिक जीवन में भागीदारी: लोगों को अपने सांस्कृतिक जीवन में भाग लेने का अधिकार है।
महत्वपूर्ण सिद्धांत
  • सार्वभौमिकता: ये अधिकार किसी विशेष देश, जाति या लिंग तक सीमित नहीं हैं; ये सभी पर लागू होते हैं।
  • अविभाज्यता: सभी मानवाधिकारों का महत्व समान है और उन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता है।
  • समानता: इन अधिकारों के अनुसार, सभी के साथ बिना किसी भेदभाव के समान व्यवहार किया जाना चाहिए।
  • जिम्मेदारी: व्यक्ति अपने अधिकारों का उपयोग करते समय दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
    • नवाधिकारों को मुख्य रूप से पाँच प्रकारों में बाँटा गया है: नागरिक और राजनीतिक अधिकार, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार, और एकजुटता के अधिकार। इन अधिकारों में व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, गरिमा और समाज में भागीदारी से संबंधित अधिकार शामिल हैं।

    अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस हर साल 10 दिसंबर को मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR) को अपनाया था। इस दिन का उद्देश्य दुनिया भर में मानवाधिकारों के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना और लोगों को उनके अधिकारों की रक्षा के लिए प्रेरित करना है।

    अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के मुख्यालय अलग-अलग स्थानों पर स्थित हैं

    भारत में मानवाधिकारों की स्थिति जटिल है, क्योंकि एक तरफ भारतीय संविधान कई मौलिक अधिकार देता है, वहीं दूसरी ओर मानवाधिकारों के उल्लंघन की भी कई घटनाएँ सामने आती हैं, जैसे कि सांप्रदायिक दंगे, पुलिस द्वारा दुर्व्यवहार और कुछ कानून (जैसे अफस्पा) से जुड़े विवाद। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और जम्मू-कश्मीर में स्वायत्तता को लेकर भी चिंताएं व्यक्त की गई हैं, जिससे कुछ समूहों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं।
भारत में मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अभी भी यह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है
। सरकार, राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोगों तथा गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) जैसे विभिन्न निकाय मिलकर इस दिशा में काम कर रहे हैं
जागरूकता बढ़ाने के प्रमुख उपाय
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राज्य मानवाधिकार आयोग: ये आयोग मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की जाँच करते हैं और सरकार को सुझाव देते हैं। NHRC जागरूकता कार्यक्रम चलाता है, जिसमें पुलिस अधिकारियों, सरकारी अधिकारियों और अन्य हितधारकों को प्रशिक्षित किया जाता है।
  • संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा: भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार, जैसे समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22) और शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24), मानवाधिकारों को कानूनी मान्यता देते हैं। ये नागरिकों को न्यायपालिका से सीधे संपर्क करने का अधिकार भी देते हैं।
  • कानूनी साक्षरता और शिक्षा: लोगों को उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित करने के लिए कानूनी साक्षरता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। मानवाधिकारों को शैक्षिक पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया जा रहा है, जिससे युवा पीढ़ी में जागरूकता बढ़े।
  • गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भूमिका: NGO ज़मीनी स्तर पर जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे हाशिए पर रहने वाले समूहों, महिलाओं और बच्चों को उनके अधिकारों और कानूनी उपायों के बारे में जानकारी देते हैं।
  • संचार माध्यमों का उपयोग: जागरूकता फैलाने में मीडिया की भूमिका अहम है। समाचार पत्रों, टीवी और डिजिटल मीडिया के माध्यम से मानवाधिकारों से संबंधित मुद्दों को उजागर करके जनता तक जानकारी पहुँचाई जाती है।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन
    अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन 10 दिसंबर 1948 को किया गया था।
    • मानवाधिकार दिवस का आयोजन: हर साल 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है, जो मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा की वर्षगाँठ का प्रतीक है। यह दिन लोगों को उनके अधिकारों की याद दिलाता है और जागरूकता बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।
चुनौतियाँ
  • सीमित पहुँच: भारत जैसे विशाल और विविध देश में मानवाधिकार जागरूकता सभी लोगों, विशेषकर ग्रामीण और दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक नहीं पहुँच पाती है।
  • जागरूकता की कमी: बहुत से लोग, खासकर वंचित तबके, अपने मूल अधिकारों और उन्हें लागू कराने के तरीकों से अनभिज्ञ होते हैं।
  • मानवाधिकार उल्लंघनों का बढ़ना: तमाम प्रयासों के बावजूद, मानवाधिकार उल्लंघनों की घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।
भविष्य की राह
मानवाधिकार जागरूकता को प्रभावी बनाने के लिए इन उपायों को और सशक्त करने की आवश्यकता है:
  • जागरूकता कार्यक्रमों को जमीनी स्तर तक पहुँचाना।
  • शिक्षा के माध्यम से मानवाधिकारों को बचपन से ही पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना।
  • महिलाओं, बच्चों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों पर विशेष ध्यान देना।
  • न्यायिक प्रणाली को अधिक सुलभ और त्वरित बनाना ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।
मानवाधिकार वे मौलिक अधिकार हैं जो मनुष्य होने के नाते सभी को प्राप्त होते हैं, चाहे उनकी राष्ट्रीयता, लिंग, धर्म या कोई अन्य स्थिति कुछ भी हो। ये अधिकार सार्वभौमिक हैं और इनमें जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, गुलामी और यातना से मुक्ति, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, तथा काम और शिक्षा जैसे अधिकार शामिल हैं। ये सम्मान, समानता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हैं और सभी को गरिमा के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित करते हैं।
भारत में मानवाधिकारों की स्थिति के कुछ पहलू:
    • संवैधानिक अधिकार: भारत का संविधान समानता, स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता जैसे कई मौलिक अधिकार प्रदान करता है, 
    • उल्लंघन के आरोप: धार्मिक अल्पसंख्यकों और अन्य कमजोर समुदायों के खिलाफ मानवाधिकारों के उल्लंघन की खबरें आती रहती हैं।
    • कानूनी मुद्दे: कुछ कानून, जैसे कि अफस्पा, मानवाधिकारों के उल्लंघन के कारण विवादित रहे हैं और इसके कुछ हिस्सों को हटा भी दिया गया है।
    • पुलिस की बर्बरता: पुलिस हिरासत में यातना और दुर्व्यवहार के मामले सामने आए हैं, जिनमें अक्सर कमजोर समुदायों के लोग शामिल होते हैं।
  • डिजिटल और ग्रामीण मुद्दे: डिजिटल प्रतिबंधों और ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच की कमी ने भी मानवाधिकारों को प्रभावित किया है, (BBC।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC): यह आयोग मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करता है, लेकिन इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, 
  • अंतर्राष्ट्रीय चिंताएँ: कई अंतर्राष्ट्रीय संगठन और सरकारें भी भारत में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर चिंता जताती हैं।
यह स्थिति दर्शाती है कि भारत में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक ढांचे और कानूनों के बावजूद, कई चुनौतियाँ मौजूद हैं जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है।
आतंकवाद-निरोध एक मानवाधिकार मुद्दा है, क्योंकि जिस तरह से राज्य आतंकवाद के खतरे पर प्रतिक्रिया करता है, उसमें असाधारण उपाय शामिल हो सकते हैं, जो मौलिक अधिकारों सहित लंबे समय से स्थापित कानूनी सिद्धांतों से अलग होते हैं।
अलगाववाद और मानवाधिकारों के बीच एक जटिल संबंध है, जिसमें अलगाववादी आंदोलन अक्सर मानवाधिकारों के उल्लंघन का कारण बनते हैं और उसी का परिणाम भी होते हैं। एक ओर, अलगाववादी आंदोलन मानवाधिकारों की रक्षा करने या अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखने के लिए एक वैध प्रयास हो सकते हैं, जबकि दूसरी ओर, वे हिंसा और भेदभाव को भी जन्म दे सकते हैं जो मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। 
अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में मानवाधिकारों को अंतरराष्ट्रीय संधियों, सम्मेलनों और घोषणाओं के एक समूह के माध्यम से परिभाषित और संरक्षित किया जाता है। ये कानून सरकारों को अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने और उनका सम्मान करने के लिए बाध्य करते हैं, जबकि मानवाधिकार उच्चायुक्त का कार्यालय जैसे संगठन मानवाधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के लिए काम करते हैं। यह ढांचा, जिसे मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा ने प्रेरित किया था, न्याय और समानता के सार्वभौमिक सिद्धांतों को कायम रखता है। 
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून
    • नींव: मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का आधार माना जाता है। हालांकि यह सीधे तौर पर बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इसने कई कानूनी रूप से बाध्यकारी संधियों को प्रेरित किया है।
    • बाध्यकारी संधियां: राज्यों ने मानवाधिकारों की रक्षा और संवर्धन के लिए कई संधियों पर हस्ताक्षर और अनुसमर्थन किया है, जैसे कि नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि और आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि। ये संधियां राज्यों के लिए कानूनी दायित्व बनाती हैं।
    • राज्यों के कर्तव्य: राज्यों के लिए तीन मुख्य दायित्व हैं:
      • सम्मान: मानवाधिकारों के हनन में हस्तक्षेप करने से बचना।
      • संरक्षण: व्यक्तियों और समूहों को मानवाधिकारों के हनन से बचाना।
      • पालन: मानवाधिकारों के पालन को बढ़ावा देने के लिए सकारात्मक कार्रवाई करना।
  • अधिवेशन और निगरानी: राज्यों को मानवाधिकारों का उल्लंघन होने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेह ठहराने के लिए तंत्र मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय यूरोपीय देशों में मानवाधिकारों पर यूरोपीय कन्वेंशन के कार्यान्वयन की निगरानी करता है। 

 

मानवाधिकारों को बढ़ावा देने वाले संस्थान और पहल
संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार उच्चायुक्त का कार्यालय मानवाधिकार के क्षेत्र में अग्रणी संस्था है।
  • अंतर्राष्ट्रीय संगठन: विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठन, जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार महासंघ (FIDH), मानवाधिकारों की रक्षा और संवर्धन के लिए काम करते हैं।
  • विशिष्ट कन्वेंशन: संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओं, बच्चों, विकलांग व्यक्तियों और अन्य कमजोर समूहों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई विशिष्ट कन्वेंशन भी बनाए हैं। 

 

भारत में मानवाधिकार
  • भारत मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के सिद्धांतों को स्वीकार करता है और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों का पक्षकार है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर, मानवाधिकारों को अक्सर मौलिक अधिकारों के रूप में संवैधानिक संरक्षण दिया जाता है, जो कानून के शासन की स्थापना और बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक शोषण को रोकने के लिए बनाए गए हैं।
  • हालांकि, भारत में मानवाधिकारों का उल्लंघन भी होता है, जैसा कि बच्चों के खिलाफ अपराधों की संख्या और प्रेस की स्वतंत्रता जैसे विभिन्न सूचकांकों में देश की रैंकिंग से पता चलता है। 
प्रस्तुति- लाखन सिंह बघेल
वरिष्ठ पत्रकार
पता- केवी नगर , खेरिया मोड़ आगरा
मो. 9837099521

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